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एम्स के छात्र डॉ बालमुकुन्द भारती की हत्या का दोषी कौन?

May 28, 2011

This article has been translated from the previous blog post ‘Who Killed Dr. Balmukund Bharti in AIIMS‘ by Ratnesh Kumar, PhD, Babasaheb Ambedkar National Institute of Social Sciences, Mhow, Indore.

'फक ऑफ फ्रॉम दिस विंग'-एम्स के SC/ST विद्यार्थियों के लिए एक सन्देश. (सौजन्य: द टेलीग्राफ)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मंत्रालय, भारत शासन ने वर्ष २००६ में ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साईंसेस (AIIMS), नयी दिल्ली, के दलित और आदिवासी विद्यार्थियों द्वारा संस्थान में व्याप्त  जाति भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए  तत्कालीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो एस के थोरात के नेतृत्व में एक ३ सदस्यीय कमेटी  का गठन किया था.

कमेटी  ने अपनी रिपोर्ट ५ मई २००७ को सौंपी जिसमे न सिर्फ देश के इस  ख्याति प्राप्त शिक्षण संस्था के दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के प्रति जाति विद्वेष की भयावह दास्तान सामने आई  बल्कि  संस्थान के कुछ अनुसूचित जाति और जनजाति के शिक्षको की भी व्यथा  प्रकट हुई. परन्तु इसके बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया.

इस रिपोर्ट की सिफारिशों  के आधार पर न तो कार्रवाही की गई और न ही किसी दोषी को दण्डित किया गया.

तीन साल बाद, ३ मार्च २०१० को एम् बी बी एस (MBBS) अंतिम वर्ष के एक दलित छात्र बालमुकुन्द भारती ने अपने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसके कुछ दिनों पहले भी वह आत्महत्या का एक असफल प्रयास कर चुका था.

एम्स प्रशासन ने अपना रटा रटाया बयान दिया कि ” उक्त छात्र एम्स के कठोर शैक्षणिक वातावरण से तालमेल नहीं बिठा पाने की वज़ह से गहरे डिप्रेशन में चला गया था.”

पुलिस ने भी मृतक के पिता जो कि अपने बेटे की लाश लेने आये थे पर दबाव डाल कर हस्ताक्षर करवा लिए कि ‘ इस मौत का एम्स प्रशासन से कोई लेना देना नहीं है’.

इस तरह इस प्रकरण को बड़ी  आसानी से  ख़त्म  करा दिया गया. पर सच्चाई तो यह है कि डॉ बालमुकुन्द भारती को उसकी आत्महत्या करने से पहले ही मार डाला जा चुका था.

आत्महत्या  तो महज़ एक औपचारिकता भर थी.

प्रोफेसरों के द्वारा अपशब्दों की मार, पीड़ा और प्रताड़ना, वरिष्ठ छात्रों से रेगिंग के नाम पर बुरी तरह से पिटाई खाने और कैम्पस की मुख्यधारा से पूरी तरह से कटने का एकमात्र कारण उसका दलित होना था. डॉ भारती ने संस्थान में इस पीड़ा को पूरे ६ साल तक झेला था.

यह एक अत्यंत ही कष्टकारी और धीमी मौत थी.

बालमुकुन्द ने अपने कटु अनुभव माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों से बांटे थे. जिनकी रिकॉर्डिंग हमने “The Death of Merit ” डोक्युमेंट्री  में की है.

कृपया इस डोक्युमेंट्री को आप अवश्य देखें.

 भाग  I

 भाग II

यदि  कोई डॉ भारती की मौत से तीन साल पहले आई प्रो थोरात कमेटी की रिपोर्ट को पढ़े  तो उसके लिए  लिए बालमुकुन्द के माता-पिता द्वारा उसके संघर्ष के बयान पर कोई आश्चर्य नहीं होगा, और ना ही उसकी आत्महत्या पर .

हमें, बल्कि,  बाकी दलित और आदिवासी विद्यार्थियों का इस अमानवीय उत्पीडन और हिंसा सहने के बाद भी अपनी हिम्मत और दृढ़ता से उस कैम्पस में जीवित रहना आश्चर्यचकित करता है जिसका घोषित उद्देश्य उन्हें डॉक्टर  बनाकर मानवता की  सेवा करना है.

शायद डॉ भारती कि मौत टाली जा सकती थी, वह शायद जी सकता था और अपने सपनो को साकार करते हुए डॉक्टर भी बन सकता था यदि शासन तीन साल पहले आई प्रो. थोरात कमेटी कि रिपोर्ट को लागू करने का  हलका सा भी प्रयास करता.

प्रो. थोरात कमेटी

एम्स में व्याप्त जाति उत्पीडन के मामलो को देखने के लिए १२ सितम्बर २००६ को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, भारत सरकार द्वारा प्रो. थोरात कमेटी का गठन किया गया.

इस समिति के तीन सदस्य थे-

१ प्रो. एस के थोरात (अध्यक्ष, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)
२ डॉ के एम् श्याम प्रसाद (उपाध्यक्ष, राष्ट्रिय परीक्षा बोर्ड )
३ डॉ आर के श्रीवास्तव( निदेशक सामान्य स्वस्थ्य सेवा)

एम्स प्रशासन की बेरुखी और असहयोग

प्रो. थोरात कमेटी ने अपनी छानबीन की शुरुआत करने से पहले एम्स के निदेशक और प्रशासन से अनुरोध किया था कि वे अपने विद्यार्थियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों का कमेटी के सदस्यों से मिलने का प्रबंध करे.

कमेटी के सदस्यों ने इसके लिए सीधे निदेशक से भेंट की और उनसे अनुरोध किया कि वे विद्यार्थियों को कमेटी के बारे में सूचित करे तथा मिलने के लिए एक निश्चित स्थान की जानकारी को भी  नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दे. परन्तु कमेटी को गहरा आश्चर्य हुआ कि निश्चित तिथि और समय पर उसे किसी भी विद्यार्थी या कर्मचारी का कोई जवाब नहीं मिला.

बाद में पता चला कि एम्स प्रशासन द्वारा कमेटी के अनुरोध को पूरी तरह नकार दिया गया है और दलित और आदिवासी विद्यार्थियों तथा संकाय  सदस्यों को कमेटी के बारे में बताया तक भी नहीं गया है.

एम्स प्रशासन, खासतौर पर निदेशक पी वेणु गोपाल का जातिभेद की जांच के खिलाफ इतनी बेरुखी थी कि उन्होंने उच्च शिक्षा विभाग के आला शासकीय अधिकारियों के द्वारा कैम्पस में व्यापत जाति-भेद पर रिपोर्ट मांगने पर उसका जवाब देना तक मुनासिब नहीं समझा.

इस सम्बन्ध में अंग्रेजी राष्ट्रीय दैनिक, द टाईम्स ऑफ़ इंडिया, १४ नवम्बर २००६, में छपी मनोज मित्ता की रिपोर्ट के अनुसार-

जब तत्कालीन उच्च शिक्षा सेक्रेटरी  सुदीप बनर्जी ने सितम्बर २६ को एम्स निदेशक पी वेणुगोपाल से लिखित रूप से उत्कृष्ट मेडीकल कॉलेज में दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के उत्पीडन पर रिपोर्ट मांगी तो उन्होंने इसका कुछ भी जवाब नहीं दिया.

जब सरकार ने  १३ सितम्बर को यू जी सी अध्यक्ष प्रो सुखदेव थोरात की अध्यक्षता में एम्स में व्याप्त अस्पृश्यता की जांच कराने हेतु एक तीन सदस्यी कमेटी का गठन किया तो वेणुगोपाल ने पैनल को अपना नोटिस जिसमे पीड़ित विद्यार्थियों से प्रमाण के साथ कमेटी से मिलने का आमंत्रण था को कैम्पस में नहीं लगाने दिया.

मनोज मित्ता आगे लिखते हैं-

राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के उपाध्यक्ष श्याम प्रसाद, जो की एम्स में व्याप्त जाति भेद की जांच कर रही थोरात कमेटी  से जुड़े थे, ने कहा कि वेणुगोपाल, पैनल को सुचारू रूप से काम करने के लिएआवश्यक सहयोगनहीं दे  रहे है.

प्रशासन ने थोरात कमेटी के नोटिस  को कैम्पस में लगाने के आग्रह पर ध्यान नहीं दिया. संस्थान  निकाय की मीटिंग में प्रसाद ने बताया कि जो लोग थोरात कमेटी तक पहुंचे  उन्हें भी अन्य  लोगो ने कमेटी के सामने अपना बयां देने के लिए धमकाया था परिणामस्वरूप, थोरात कमेटी अपनी रिपोर्ट निर्धारित तिथि अक्टूबर १३ तक नहीं सौंप पाई.

(इसे पढने के लिए द टाईम्स ऑफ़ इंडिया के समाचार पर क्लिक करे)

एम्स प्रशासन की इस बेरुखी और असहयोग से प्रो थोरात को अंततः विद्यार्थियों से प्रत्यक्ष संपर्क (Direct contact) करना पड़ा और उन्हें इस कार्य के लिए एम्स से बाहर एक स्थान चुनना पड़ा.

कमेटी  ने अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या ८ पर इस बात का साफ़ तौर पर ज़िक्र किया है कि   –

प्रबन्धन द्वारा नोटिस नहीं लगाने की शिकायत  पर जांच के लिए जब कमेटी  अध्यक्ष और एक सदस्य ने एम्स का दौरा किया तो  पाया कि वास्तव में नोटिस चस्पा नहीं किया गया था.

दलित और आदिवासी  विद्यार्थियों में   प्रशासन की मर्जी के खिलाफ जा कर अपना बयान देना भयभीत करने वाला था क्योंकि इससे पहले जिन भी दलित-आदिवासी छात्रों ने कबही किसी कमेटी के सामने अपनी शिकायते दर्ज कराइ थी उन्हें उल्टा प्राधिकारियों द्वारा तंग ही किया गया था. अतः कमेटी ने निर्णय लिया की वह प्रत्यक्ष संपर्क (Direct contact) विधि के माध्यम से एम्स के बाहर ही  विद्यार्थियों से मिलेगी.

अत्यंत शर्मनाक बात थी कि एक सरकारी संस्था जो पूरी तरह जनता के पैसे से चल रही है, वह भारतीय संविधान का उल्लंघन कर और सरकार के आदेश की अवहेलना करते हुए जाति भेद की जांच के लिए गठित  सरकारी कमेटी  से  असहयोग कर रही थी.

एम्स शिक्षको  द्वारा किये जाने वाला जातिगत भेदभाव

एम्स की परीक्षा व्यवस्था में योगात्मक (summative) परीक्षा और आतंरिक मूल्यांकन दोनों होते है . और फ़ाइनल परीक्षा ke ५० प्रतिशत अंक, आतंरिक परीक्षा के माध्यम से निर्धारित होते हैं. अतः इस प्रक्रिया में  शिक्षक के लिए भेदभाव करने का पूरा मौका होता है. प्रो थोरात कमेटी ने सर्वे और साक्षात्कार विधि के द्वारा एम्स के SC/ST विद्यार्थियों का उनके शिक्षको के साथ अनुभव जानने  का प्रयास किया.

 रिपोर्ट के पृष्ठ १९ पर कमेटी उल्लेख करती है-

सर्वे में प्रश्न पूछा गया कि  क्या SC/ST विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष शिक्षण सत्र (One to One Teaching session) और प्रयोगशालाओं में प्रदर्शन (Demonstration) के समय किसी भेदभाव का सामना करना पड़ता है तथा किस हद तक इन विद्यार्थियों को शिक्षको से सलाह-मशविरा आदि लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. कमेटी ने विद्यार्थियों से चर्चा और साक्षात्कार के माध्यम से भी इन सवालो का जवाब जानने की कोशिश की.

कमेटी के सामने अपने विचार व्यक्त करते हुए बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी विद्यार्थियों ने बताया कि उनका शिक्षको के साथ कोई चर्चा और संपर्क नहीं हो पाता और उन्होंने यह भी बताया कि  किस तरह कुछ विद्यार्थियों  को उनकी जाति की वज़ह से पढ़ाते समय नज़र अंदाज़ किया जाता है.

पृष्ठ २० पर कमेटी लिखती है-

मेडिकल क्षेत्र में विद्यार्थियों को  कौशल सीखने के लिए शिक्षकों पर निर्भर होना पड़ता है. पर इस संस्थान में  SC/ST विद्यार्थियों को उनके शिक्षकों की तरफ से कोई सहयोग नहीं मिलता और  ना ही अन्य विद्यार्थी इन्हें किसी भी तरह का सहयोग देते है. इसतरह की बेरुखी का SC/ST विद्यार्थियों पर गहरा मानसिक  असर होता है, जिससे उनके प्रदर्शन पर विपरीत असर पड़ता है और वे कम ग्रेड पाते है या फिर फेल भी हो जाते हैं .

SC/ST विद्यार्थियों के साथ पूरी बेरुखी दिखाने के अलावा ये शिक्षक पढाई के सत्र में भी इनके साथ भेदभाव करते है फिर चाहे वह प्रयोगशाला हो, प्रक्टिकल परीक्षा हो या थेओरी पेपर की जांच करने का मामला.

लगभग ८८ प्रतिशत  अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों ने प्रो थोरात कमेटी को अपने जवाब में बताया की शिक्षक उन्हें लिखित परीक्षा में उतने अंक नहीं देते जिनके कि  वे  हकदार है. प्रेक्टिकल परीक्षा और वाइवा (viva) में भी उन्हें इसी बदनीयती का सामना करना पड़ता है. विद्यार्थियों ने बताया कि यहाँ तो भेदभाव एकदम खुले और घटिया तौर पर होता है.

लगभग 92 प्रतिशत SC/ST विद्यार्थियों ने कमेटी के सामने शिक्षको के जातिवादी रवैय्ये की खुलकर बात कही और बताया कि प्रेक्टिकल और वाइवा में शिक्षक उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी जातीय पृष्ठभूमि के बारे में पूछते हैं जिनसे उनके ग्रेड प्रभावित होते हैं.

एम्स फैकल्टी के भेदभावपूर्ण व्यवहार पर दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के व्यक्तिगत साक्ष्य:

 कमेटी की रिपोर्ट में बहुत से दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के व्यक्तिगत साक्ष्य हैं, जिनमे में से दो का विवरण यहाँ दिया जा रहा है-

प्रकरण  1 (रिपोर्ट का पृष्ठ २३)

फाइनल प्रोफेशनल परीक्षा के बाद मेरे एक प्रोफेसर ने मुझसे पूछा कि मै किस जगह से आता हूँ, मैंने उन्हें बताया कि गाज़ियाबाद. एक सीनियर रेसिडेंट जो IRCH में डी एम् कर रहा है के सामने उन्होंने कहा कि ये ‘बदमाश’ है और इसे परीक्षा पास करने से रोकना होगा. इसलिए मुझे लगातार esfMflu में फेल किया जाता रहा.

 मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि मैं पिछले तीन सेमेस्टर में इस विषय में कभी भी फेल नहीं हुआ था. मैंने इस विषय  में प्री फ़ाइनल  परीक्षा ६० प्रतिशत अंको के साथ पास की थी. जब मैंने अपना प्रश्न पत्र चेक किया तो मुझे लगा कि शायद मेरी कॉपी चेक ही नहीं की गयी थी.

 मैंने यह परीक्षा ६ महीने बाद दुबारा दी  पर मुझे फिर इस विषय में फेल कर दिया गया. मै लगातार परीक्षा देता गया और मुझे लगातार एक साल तक इस विषय में फेल किया जाता रहा . अंत में मैंने इस पेपर को चार अन्य पेपर के साथ एक ही प्रयास में पास कर लिया. यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि इस समय वह टीचर छुट्टी पर था इसलिए यह परीक्षा एक अन्य टीचर ने ली थी. बार-बार फेल होने से मेरी छवि ख़राब हो गई थी जिससे मुझे गहरा मानसिक आघात पंहुचा था .

 प्रकरण २ (रिपोर्ट के पृष्ठ २३-२४)

आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को हर समय फेल किया जाता है. पिछले साल किसी  भी SC विद्यार्थी को उनके  पहले साल की फाइनल प्रोफेशनल परीक्षा में पास नहीं होने दिया गया.

उदहारण के लिए, सुजो को पहली प्रोफेशनल परीक्षा में ७० प्रतिशत अंक मिले और दूसरी प्रोफेशनल परीक्षा में ५५ प्रतिशत अंक मिले परन्तु  अंतिम प्रोफेशनल परीक्षा में वह पास भी न हो सका जिससे उसे इतनी पीड़ा हुई की वह मानसिक तनाव में पहुँच गया और उसे अपना इलाज करवाना पड़ा.

बहुत से प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को अंतिम परीक्षा में पास नहीं किया गया. जबकि उन्होंने पहले की परीक्षाओ में बहुत अच्छा किया था.

ऐसा लगता है की संस्थान काबिल अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों को पहले ही वर्ष रोककर एक यह जताना चाहता है की आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी ऐसे ही होते है.

एम्स के शिक्षको का दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के प्रति रुख और संस्थान में व्याप्त भयावह जातिवादी माहौल  देखकर कमेटी  अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ २६ पर कहती है –

…..समस्या बहुत गहरी है और इसका सम्बन्ध कुछ उच्च जाति के शिक्षको के रव्वैये से है जिनमे से कुछ का  रुख SC/ST के लिए भेदभाव, घृणा तथा असहयोग से भरा होता है.

एम्स प्राधिकरण को इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना होगा. इसके लिए शायद एम्स के शिक्षको को SC/ST विद्यार्थियों के लिए संवेदनशील होने और उनके लिए सहयोगी होने के वास्ते कुछ प्रशिक्षण की जरुरत होगी.

शिक्षको के द्वारा ख़ारिज किये जाने से इस मुद्दे का कोई हल नहीं होगा. यदि SC/ST विद्यार्थी अलग- थलग  महसूस करते है तो इसके लिए एक बिना धमकी वाले वातावरण में खुले संवाद की अत्यंत जरुरत है.

होस्टलो में दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के सामने पेश आने वाली परेशानिया

कमेटी  पृष्ठ ३० पर लिखती हैं-

काफी समय से मीडिया में, विद्यार्थियों और शिक्षको के बयान के आधार पर, रिपोर्टें आई कि आरक्षण विरोधी आन्दोलन के बाद से अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य विद्यार्थियों के बीच सामाजिक भेद उभर कर आया है.

मीडिया ने लिखा कि  १) होस्टलो के कमरे आवंटन, २) मेस में ३) मिलने-जुलने ४) सांस्कृतिक उत्सव और ५) खेल-कूदो में जाति भेद साफ़ नज़र आ रहा है.

हमने इस पक्ष को जानने के लिए दो विधियों का पालन किया. जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, हमने एक प्रश्नावली विद्यार्थियों को बाँट दी जिनमे से हमें उन २५ विद्यार्थियों का जवाब मिला जो हमसे अपने अनुभव बांटना चाहते थे.

कमेटी  ने इन होस्टलो में जाकर उन विद्यार्थियों से बात की और उनके बयान रिकॉर्ड किये परन्तु उनकी पहचान सुरक्षित रखी गयी.


०५ जुलाई २००६ को द टेलिग्राफ अखबार में २२ SC/ST विद्यार्थियों को बेइज्ज़त कर कमरे छोड़ने पर विवश   इलाज करने का मामला सामने आया था. इस समाचार को प्रो थोरात कमेटी  ने आधार बनाते हुए दलित-आदिवासी विद्यार्थी और सवर्ण विद्यार्थियों के बीच व्याप्त जाति-भेद को जांचने का कार्य आरंभ किया.

एम्स के कोटा विद्यार्थियों को जबरन एक कोने में डाला गया
चारू सुदन कस्तूरी , द टेलिग्राफ, जुलाई ०५, २००६

एम्स का  कुछ भाग अनुसूचित जाति/जनजाति के पृथक्करण का स्थान बन गया है. आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को उच्च जाति के विद्यार्थियों द्वारा उनके कमरों से ढूंढ-ढूंढ कर होस्टलो के दो मंजिलो में ठूस दिया गया.

'Fuck off from this wing" was engraved on the door of room 49, (Hostel1)

हॉस्टल १ उमाकांत के रूम न. ४९ के दरवाजे पर बेहद गन्दी गाली से खुदा सन्देश इसकी गवाही देता है. इस सन्देश में उमाकांत के माध्यम से सारे  दलित-आदिवासी विद्यार्थियों को साफ़ कहा गया कि  ‘वे हॉस्टल के इस विंग से चले जाये.’ आधे से अधिक दलित-आदिवासी विद्यार्थियों का अपना रूम बदलना यह दिखाता है कि यह सन्देश काम कर गया.

देश के नामी मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल न. ४ और ५ की दोनों उपरी मंजिलो में कुल ३२ कमरे हैं जिनमे से २७ कमरों में  अनुसूचित जाति/जनजाति विद्यार्थी हैं. संस्थान में कुल २५० विद्यार्थियों में ५५ अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं.

हॉस्टल का रिकॉर्ड बताता है की २२ विद्यार्थियों का पृथक्करण आरक्षण विरोधी आन्दोलन के कारण हुआ जब मानव संसाधन मंत्रालय ने अन्य पिछड़े वर्ग के लिए कोटा लाने की सिफारिश की थी. एक छात्र ने बताया कि अन्य दलित भी इस जगह आना चाहते हैं पर जगह की कमी के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे.

एम्स के प्राधिकारियों ने कहा कि  वे “आवश्यक कार्यवाही” करेंगे.

उप-डीन डा. सुनील चुम्बेर ने कहा की अपने कॉलेज के दिनों में उन्होंने खुद उस तरह के भेदभाव झेले हैं, “मेरे कमरे में तोड़-फोड़ की गई थी, सामान बर्बाद कर दिया गया था, क्योंकि में आरक्षित वर्ग से आता हूँ”

एक सेनियर रेसिडेंट डॉक्टर के अनुसार “चूँकि, निदेशक पी वेनोगोपाल खुद आरक्षण विरोधयों का समर्थन करते हैं  ऐसे में हम अपनी शिकायत किसे दर्ज कराएं”

वँही रेसिडेंट डॉक्टर्स असोसिएशन  के अध्यक्ष डॉ विनोद पात्रो  जो आरक्षण विरोधी आन्दोलन में अहम् भूमिका निभा रहे हैं  ने कहा की “एम्स कैम्पस में कोई भेदभाव नहीं होता” और  “यह महज उनकी कल्पना है”

कुछ अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों ने कहा कि इस भेदभाव का खुलासा करने पर हमें परीक्षा में फेल कर देने की धमकी मिली है.

एक रेसिडेंट डॉक्टर ने अपना उदहारण देते हुए कहा कि उसे खुद पहले ही साल में फेल कर दिया गया था एवं  प्रत्येक वर्ष आरक्षित वर्ग के औसत ११  में से ५  विद्यार्थियों को रोक दिया जाता है.

एम्स का नियम कहता है की पांच सालो में यदि कोई एक ही वर्ष में दो बार फेल हो जाता है तो वह अपना पोस्ट ग्रेड्यूएशन नहीं कर सकता.”

इसलिए विद्यार्थियों ने बताया की करियर बिगड़ जाने के डर से  वे प्राधिकारियों के सामने अपनी छवि नहीं बिगाड़ना चाहते हैं.  मेडीकोस फोरम फॉर इक्वल ओपोरट्युनिटिस – एक आरक्षण समर्थक समूह – के डॉ विकास बाजपाई कहते हैं “विद्यार्थियों के पास पांच साल तक सहन करने के सिवाय कोई और चारा नहीं बचता”.

राष्ट्रीय दैनिको में छपी ऐसी कई रिपोर्टो के बावजूद एम्स प्रशासन ने इस ओर कोई कदम नहीं उठाया उलटे इन बातो को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि छात्र-छात्राओं ने अपने कमरे सीलन या टी वी  रूम  से नजदीकी से परेशान होने आदि कारणों से बदले हैं.

एम्स के हॉस्टल सेक्शन के एक पत्र (दिनांक ०३/०८/०६ के अनुसार) जो श्रीमती के  ढाका (वरिष्ठ वार्डेन) प्रो एस  दत्ता (उपनिरीक्षक हॉस्टल) प्रो जे एस तितियल (उप निरीक्षक हॉस्टल), डॉ एस एस काले (उप निरीक्षक हॉस्टल, डॉ मिनती चौधरी (उप निरीक्षक हॉस्टल) प्रो जी के रथ (अधीक्षक हॉस्टल) और एम्स के निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित में इसका उल्लेख मात्र करते हुए इस प्रकरण को बंद कर दिया गया.

पिछले कुछ हफ़्तों में हमने अलग-अलग छात्रों से तफसील से उनके रूम छोड़ने पर चर्चा की, जिनमे अलग अलग अंडर ग्रेदूएट पुरुष होस्टलो से आंकड़े एकत्र किये तो पाया की २९ छात्रों ने रूम बदलने के लिए आवेदन किया था जिनमे सीलन, टी वी रूम से तकलीफ, सीढ़ी से दूरी, मेस और स्वास्थ्य सम्बन्धी कारण गिनाये गए थे.

होस्टलो में जाकर सम्बंधित छात्रों से मिलने पर प्रो. थोरात कमेटी को पता चला की २९ अनुसूचित जाति/ जनजाति को जातिगत अत्पिदन कि वजह से अपना रूम छोड़ना पड़ा.   ‘उच्च’ जाति के छात्रों ने इन पर लगातार दबाव डाल , अपमानित कर और मार पीट कर अपने कमरे छोड़ने के लिए मजबूर किया.

कमेटी ने समबन्धित छात्रों के बयान रिकॉर्ड किये जिनको रिपोर्ट में संलग्न किया गया है. उनमे से एक बयान को नीचे दिया जा रहा है (पृष्ठ संख्या ७, संलग्नक ३.२)

कृपया बताएं की आपका यहाँ कैसा अनुभव रहा है ?

मेरा कमरा बेतरतीब था, इसलिए मुझे यू जी  हॉस्टल १ में शिफ्ट करना पड़ा पर वहां भी ४-५ दिनों के बाद मेरे  कमरे में बाहर से ताला लगाया जाने लगा.

कब तक यह ताला बंद रहा?

कोई ताला लगाकर चला जाया करता था, मुझे अपने दोस्तों को बुलाकर इस ताले को तुडवाना पड़ता था. यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. हफ्ते के आखिरी दिन में, मैं घर चला जाया करता था.  एक इतवार जब में घर गया हुआ था और शाम को लौटा तो पाया की दरवाजे पर बहुत भद्दी गालियाँ लिखी हुई थी.

क्या लिखा हुआ था?

‘फक ऑफ फ्रॉम दिस विंग- हरामी इस विंग को छोड़ दो”

क्या आपने शिकायत दर्ज कराई थी?

जी हां, मैंने हॉस्टल के ऑफिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी.

फिर?

एक हफ्ते तक प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाही नहीं तब मैं उनके पास गया. उसके बाद  प्रशासन ने दरवाजे पर लिखने वालो को बुलाकर उनसे पूछा कि  ‘आपने ऐसा क्यों लिखा?’ लेकिन कोई कार्रवाही नहीं की गई ..

क्या वे जानते थे कि यह किसका काम है?

मैंने उन लडको का नाम बताया था जिन पर मुझे शक था.

इस पर भी उन्होंने कोई कार्रवाही नहीं की?यानि तब आपको यह कमरा छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा?

जी हाँ. यहाँ हर पल तनाव बना रहता था मैं पढ़ नहीं पा रहा था.

तो क्या इस नयी जगह अधिक दलित है?

जी हाँ यहाँ काफी है.

क्या यहाँ कोई मार-पीट भी हुई थी ?

जी हाँ, हुई थी मैंने दुबारा शिकायत दर्ज की, वे मेरे कमरे में घुसे उस वक़्त मै  खाना खा रहा था, उन्होंने मेरे साथ धक्का मुक्की की. उन्होंने मेरी कॉलर पकड़कर पलंग पर धकेल दिया.

यह क्या इसलिए की आपने  उनकी शिकायत की थी?

जी हाँ सर.

क्या आपने यह प्रशासन को सूचित किया था ?

जी हाँ.

क्या लिखित रूप में?

जी हाँ.

इसके बाद प्रशासन ने क्या किया?

उसके द्वारा कोई कार्रवाही नहीं हुई.

यहाँ  ऐसे कितने छात्र होंगे जिनका यही अनुभव होगा?

ऐसे कई जूनियर छात्र हैं, हर किसी को अलग अलग तरीके से यह झेलना पड़ा,

अब पढ़िए कि इस मुद्दे पर एम्स ने क्या किया?

प्रशासन ने दोषियों को बुलाया और इस पूरे वाकिये को बड़े ‘सौहाद्रपूर्ण’ तरीके से सुलझाया. बड़े ही विशिष्ट और  उदार भाव से पीडितो को दोषियों से हाथ मिलाने कहा गया, और हॉस्टल वार्डेन को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया की दोनों वर्गों में बराबर दोस्ती बनी रहे और दलित छात्रों को उनके कमरे बदलने दिए जाए.

नीचे हॉस्टल ऑफिसर (रूम न. १३) में २१ अप्रैल २००६ को शाम ३.०० बजे हुई मीटिंग के अंश दिए जा रहे है.

आल इंडिया इंस्टीटयूट ऑफ़ मेडिकल साईंसेस
हॉस्टल सेक्शन
ऍफ़ न.१४ -१०/२००६/हॉस्टल                                                                                           दिनांक २१.०४.२००६

विवरण

श्री उमाकांत, हॉस्टल न.१ के कमरा न. ४९ के निवासी  की ” गाली -गलौच और धमकी बाबत शिकायत (पत्र १७.०४.०६) सम्बन्धी ” जो उनके कमरे के दरवाज़े पर लिखा गया था, यह विषय जूनियर वार्डेन की सहमति से हॉस्टल सेक्शन के सम्बंधित वार्डेन तक ले जाया गया .

इसमें निम्लिखित कर्मचारी उपस्थित थे:

१ प्रो  जी के रथ (हॉस्टल  अधीक्षक)

२ डॉ एस एस काले (हॉस्टल  उपनिरीक्षक)

३ डॉ एस दत्ता गुप्ता (हॉस्टल उपनिरीक्षक)

४ श्रीमती भूपिंदर पौल (हॉस्टल उपनिरीक्षक)

५ श्रीमती कृष्णा ढाका (हॉस्टल वरिष्ठ निरीक्षक)

इनके अतिरिक्त इस मीटिंग में निम्नलिखित छात्र भी मौजूद थे:

१ श्री तारिक ज़मान (हॉस्टल सेक्रेटरी)

२ श्री उमाकांत

३ श्री सुशांत स्वरुप दास

४ श्री अमोल रहेजा

५ श्री निशांत गोयल

मीटिंग के दौरान श्री उमाकांत ने यह भी बताया कि घटना २१ अप्रैल २००६ को उसके दरवाजे पर  बाहर से ताला लगा दिया गया था, जिससे वह अपनी क्लास भी नहीं जा सका था. वँही श्री निशांत गोयल ने भी शिकायत की कि उसके कमरे और श्री अमोल रहेजा के कमरे को भी उसी दिन उसी समय बाहर से ताला लगा दिया गया था. जब दोस्तों ने रूम खोले तब दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे पर ताला लगाने का इल्ज़ाम लगाया.

छात्रों को उनके कर्त्तव्य की ओर आगाह किया गया और उन्हें बताया गया कि किसी भी किसी भी रूप में अनुशासन तोडना बर्दाश्त नहीं किया जायेगा और उन्हें अपनी पढाई पर ध्यान देने के लिए कहा गया. श्री अमोल और श्री निशांत के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं था कि उन्होंने दरवाजे पर लिखा है. फिर भी शिकायत के आधार पर उनको भविष्य में ऐसा नहीं करने की चेतावनी देकर छोड़ दिया गया.

हॉस्टल सेक्रेटरी को कठोर चेतावनी दी गयी की अब से ऐसी किसी किस्म की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों पर कठोर कार्रवाही की जाएगी.

श्री निशांत और श्री अमोल से लिखित आश्वासन लेने के पश्चात कि ऐसी घटना दुबारा नहीं होगी,  श्री उमाकांत को उसके पुराने कमरे में शिफ्ट होने की इजाज़त दे दी गई.

अंत में श्री उमाकांत, श्री अमोल और श्री निशांत ने एक दूसरे से हाथ मिलाये. श्री तारिक ज़मान (हॉस्टल सेक्रेटरी) ने आश्वासन दिया कि वह श्री उमाकांत और श्री निशांत गोयल एवं श्री अमोल रहेजा  के बीच दोस्ती कायम रखने का वादा करता  है.

दोषियों और पीड़ित के बीच इतने ‘सौहाद्रपूर्वक’और “कठोरतम” सजा के बाद जब पीड़ित हॉस्टल वापस गया तो उसके साथ फिर धक्का मुक्की की गई. दलित छात्र ने अपनी व्यथा का बयान प्रो. थोरात कमेटी से कुछ महीने पहले ही किया.

एम्स में अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों का ‘उच्च’ जाति के विद्यार्थियों द्वारा पृथक्करण, मार-पीट, गाली-गलौच  एक नियम बन चुका  है और इसका एक लम्बा इतिहास है (उपर्युक्त वाकिया अप्रैल २००६ को हुआ था) किन्तु इसको और अधिक बल ‘उच्च’ जाति के विद्यार्थियों के आरक्षण विरोधी आन्दोलन के साथ मिला जिसकी शुरुआत १३ मई २००६ से हुई थी.

प्रो थोरात कमेटी ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया कि दलित आदिवासी विद्यार्थियों को अनेक बार मारपीट, गाली-गलौच, तानाकशी और अन्य प्रकार की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा पर इस कदर प्रताड़ना के बावजूद एम्स प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया. और जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि श्री उमाकांत के मामले में एम्स प्रशासन ने जांच कमेटी गठित की और इसे वह बिना किसी को दंड दिए ‘सौहाद्रपूर्ण’ तरीके से निपटाने में सफल हुए.

वँही कुछ आतंरिक कमेटियों ने तो हमारे विद्यार्थियों को सीधे डरा-धमकाकर उन पर दबाव बनाते हुए उनसे उनकी शिकायत वापस लेने के लिए कहा गया और उन्हें सीधे चेतावनी दी कि यदि दोषियों के विरुद्ध उसने कोई कार्रवाही की तो इसका ‘हिंसक परिणाम’ होगा.

नीचे तीन दलित और आदिवासी विद्यार्थियों का जाति भेद को जांच कर रही कमेटी पर सम्पूर्ण अविश्वास को लेकर एम्स के निदेशक को लिखे गए पत्र को प्रस्तुत किया जा रहा है.

प्रति,
निदेशक
एम्स, नयी दिल्ली
दिनांक: ४ सितम्बर, २००६

विषय: जातिगत भेदभाव की शिकायतों की जांच कर रही कमेटी पर अविश्वास बाबत.

महोदय,

हम आपका ध्यान कैम्पस में हो रहे जातिभेद की शिकायतों की जांच कर रही कमेटी की ओर दिलाना चाहते हैं जो पूरी तरह  पक्षपात से युक्त है. हमें इसपर कटाई यकीन नहीं कि यह हमारी शिकायतों का वास्तविक निराकरण कर पायेगी.

सबसे पहले तो यह कि ये कमेटी निश्चित समय में उचित कदम उठाने के वायदे के बावजूद भी पर्याप्त कदम उठाने में अक्षम है. इस मामले की सुनवाई के दौरान होने वाली कार्यवाही से स्पष्ट होता है कि यह जानबूझ कर किया गया है.

दूसरा,  इस मामले की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच के बजाय  हम पर बहुत अधिक दबाव बनाने का प्रयास हुआ है कि  हम अपनी शिकायते वापिस लेले.

अंततः सारा मामला हमारी विनय  के विरुद्ध चला गया जब कमेटी के एक सदस्य ने यह कहा की ..”यदि कोई कार्रवाही भी हो गई तो उससे क्या हासिल हो जायेगा, आप कैसे पक्का कर लोगे के दोषी कोई मारपीट नहीं करेगा.”

उपर्युक्त वाकिये ने हमारा कमेटी से पूरा विश्वास उठा दिया स्पष्ट  है कि  कमेटी  पक्षपातपूर्ण है और वह सीधे तौर पर दोषियों का पक्ष ले रही है. अतः इस मामले पर पर्याप्त कार्रवाही करने की कृपा करे.

आपके सत्यनिष्ठ

(३ दलित ओर आदिवासी छात्रों के हस्ताक्षर)

iv  रेगिंग ओर जातिसूचक प्रताड़ना .

एम्स में भले ही आधिकारिक रूप से रेगिंग बंद हो गई पर सत्र के पहले महीने में  अब भी रेगिंग चलती है, पर प्रशासन आँख बंद किये बैठे रहता है. एम्स की रेगिंग में गंभीर जातिसूचक तानो और निकृष्ट किस्म अपमानजनक हरकते हैं जिसमे मारपीट, और जातिगत गालिया बहुत आम है.

प्रो थोरात कमेटी ने पाया (पृ ३६)

इस सवाल पर कि क्या हॉस्टल में अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थी को जातिगत आधारपर रेगिंग का सामना करना पड़ता है, सभी विद्यार्थियों का उत्तर “हाँ ” था. यह स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों को उनकी जातीय पृष्ठभूमि के कारण अपमान सहना पड़ता है.

कमेटी ने एम्स में दाखिल होने वाले नए दलित और आदिवासी विद्यार्थियों को पेश आने वाली परेशानियों के बारे में इंटरव्यू लिया जिसमे अन्य बातो के साथ रेगिंग का उल्लेख था.

इन इंटरव्यू के अलावा कमेटी ने विद्यार्थियों के लिखित दस्तावेज़  भी पेश किये जिन्हें रिपोर्ट के संलग्नक ३.१ और ३.२ में संलग्न  किया गया है.

जो इस तरह है –

I.  कमेटी द्वारा लिया गया छात्रो का इंटरव्यू  का लिखित संस्करण

1. वे हमें अपने रूम में बुलाकर पूछते थे कि तुम इसके दस कारण बताओ कि तुमको आरक्षण क्यों मिला है? बताओं कि तुम एम्स के काबिल क्यों नहीं हो?

यदि तुम नहीं बताओगे तो हम तुम्हारी पिटाई करके ताला लगा देंगे.

ऐसे कुछ प्रकरण थे जिनमे कमरों पर ताला लगा दिया गया था.

कुछ के रूम के बाहर बहुत सी गालियाँ लिखी गयी.

किसके रूम के आगे?

बालमुकुन्द भारती

वह कौन सा कमरा था?

हॉस्टल में दूसरा था.

2. सर, यह सामान्य धारणा है की जो तथाकथित निम्न जाति के लोग जो आरक्षित वर्ग से है को दया के आधार पर लिया जाता है.

‘निम्न’ जाति के विद्यार्थियों से इस हद तक घृणा है की यदि कोई सामान्य विद्यार्थी भी इनसे जुड़ता है तो उसे समूह से नकार दिया जाता है.

रेगिंग के समय सबके दिमाग में यह भर दिया जाता है…हर किसी की शुरुआत यहीं से होती है… तुम ये हो. और तुम्हारे साथ ऐसा ही बर्ताव होगा.

तुम यहाँ केवल आरक्षण के कारण ही हो, तुम्हे यहाँ नहीं होना चाहिए.

रेगिंग के समय वे (‘उच्च जाति के नए विद्यार्थियों ) को अलग ऊपर कुर्सी या पलंग पे बैठाया जाता है और हमें ज़मीन पर.

वे आपको बताते है, “तुम यहाँ मेरिट के कारण नहीं बल्कि आरक्षण के कारण हो” इसलिए अलग बर्ताव जरुरी है.

असल में अरक्षित वर्ग के विद्यार्थी भी उनसे नहीं भिड़ते क्योंकि उनके विरुद्ध कभी कोई कार्रवाही नहीं होती है. उन्होंने इस ट्रेंड को देखा है.

ट्रेंड यह है कि  उन्हें ही तो वाईवा लेना है. यदि तुम शिकायत करोगे तो तुम पर परेशानी पलट कर आ जाएगी.

हम जानते है की हमने बहुत अच्छा पेपर दिया परन्तु फिर भी हमें फेल  कर दिया गया.

हमको एक बफर के तौर पर रखा जाता है. सभी को पास नहीं किया जा सकता इसलिए हमें रोक दिया जाता है क्योंकि हम आरक्षित वर्ग से हैं.

२००३ में एक झगडा हुआ. यह जाति आधारित था उसमे मेरा एक बेचमेट बुरी तरह से  जख्मी हुआ.

हम लोग एस सी एस टी चेयरमेन के पास गए. हम बहुत से नेताओ के पास गए- जहाँ-जहाँ हम जा सकते थे.

इस समय निदेशक ने बड़ा ही विचित्र निर्णय सुनाया उन्होंने सीधे कहा कि “हम सभी को संस्थान से निष्काषित कर दिया जायेगा”.

इस निर्णय में  हमारा वह दोस्त भी शामिल किया गया था जिसकी जानलेवा हद तक पिटाई हुई थी.

हमें मजबूरन अपनी शिकयत वापस लेनी पड़ी.  और किसी भी दोषी को सजा नहीं हुई.

II. लिखित बयानों के कुछ अंश

१. मै (नाम) एम्स का  एम् बी बी एस छात्र बेच २००२, आपको इस संस्था में मेरे साथ हुए जातिभेद का वीभत्स व्यवहार को बताना चाहता हूँ. सर जाति भेद कि शुरुआत उसी दिन से हो गई थी जब मेने पहली बार इस हॉस्टल में कदम रखा था.

मुझे मारा गया, जाति के नाम पर अपमानित किया गया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया. यहाँ तक कि मेरे बेचमेट  जो ‘ऊँची’ जाति के थे ने जाति आधारित ताने मारना शुरू कर दिया.

मेरे हॉस्टल के विंग वाले मुझसे बात तक नहीं करते थे और जब मै इस कमरे यानि ३/४५ में आया तो उन्होंने मेरे दरवाजे पर  लिख दिया ” तुम्हे यह कोई पसंद नहीं करता,फक ऑफ़ फ्रॉम थिस विंग”

वे मुझे कैरम खेलने नहीं देते थे जो कि सबके लिए था, उन्होंने एक नोटिस भी लगा रखा  था, “इस कैरम को ३/४५ के अलावा हर कोई खेल सकता है.”

यह कोई एक घटना नहीं है बल्कि मेरे हर अनुसूचित जाति और जनजाति के मित्रो को कई तरह से जाति भेद सहना पड़ा.

२. सर मै (नाम) एम्स एम् बी बी एस  प्रथम वर्ष छात्र आपको इस पत्र के माध्यम से अपना बयान देना चाहता हूँ कि मुझे आरंभिक दिनों से इस संस्थान में जाति आधारित भेदभाव को सहना पड़ा था.

शुरूआती दिनों में मुझे ‘ऊँची’ जाति वाले छात्रों ने एकदम अलग कर दिया था और मेरे रूम को  अक्सर किसी सीनियर द्वारा बाहर से लॉक  कर दिया जाता था. यहाँ  तक कि रेगिंग में भी हम लोगो कि अलग से रेगिंग होती थी  जो सामान्य वर्ग के छात्रों से अधिक तकलीफदेह होती थी.

हॉस्टल ज्वाइन करने के ५ दिनों बाद एक सीनियर शेरी मोदी (५ व सेमेस्टर) मेरे रूम में आकर मुझे रूम छोड़ने की धमकी देने लगा और उसने कहा कि यदि में ऐसा नहीं करूँगा तो वह मुझे भविष्य में भी ऐसा ही करेगा.

६ सितम्बर की शाम को निखिल गुप्ता, आनंद वेंकेतरमण, चेरियन, नितिन मिश्र, गन्धर्व गोयल, संजीव एस नागपाल  नाम के कुछ सीनियर मेरे  दोस्त के कमरे में आये और हमें पिटवाने के लिए धमकाने लगे.

अगले दिन हमने दोषियों कि शिकायत निदेशक से की जिन्होंने हमें २४ घंटे के अन्दर कार्रवाही करने का आश्वासन दिया और हमारे नाम जाहिर कर दिए. दोषी तब  समझोते के कोशिश करते रहे,

उन्होंने हमें उनकी तरफ से उलटी शिकायत कि धमकी दी. वे झुण्ड में आने लगे और हमसे साइन लेने में सफल हुए कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया है.

यहाँ तक कि एम्स छात्र  युनियन का अध्यक्ष भी आया और कहने लगा कि हम अपना आवेदन जाति भेदभाव से हटाकर गैर रेगिंग भेदभाव की घटना की ओर केन्द्रित करे  अन्यथा पल्स नहीं होगा. पर पल्स यथावत हुआ..

पल्स के  दिन हम सभी कमरों को बाहर से  लॉक कर दिया गया. इसके लिए एक कमेटी बैठाई गई  जिसके अध्यक्ष निदेशक थे और अन्य सदस्य थे  – टी डी डोगरा , डॉ बीर सिंह, डॉ रानी कुमार.  इस कमेटी  ने कोई सकारात्मक सुझाव नहीं दिया और इसने भी समझौते का मार्ग सुझाया.

अब तक दो महीने बीत चुके है पर कोई कार्रवाही नहीं हुई.

सर मै आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप हमें इस शोषण और उत्पीडन से बचने के लिए आवश्यक कार्रवाही करेंगे.

मेस और खेल में भेदभाव 

एम्स में दलित और आदिवासी छात्रों की पीड़ा महज़ शिक्षकों के भेदभावपूर्ण व्यवहार, ‘ऊँची’ जाति के लोगो की गाली गलौच ऑर हिंसा तक ही नहीं है बल्कि यह भेदभाव हॉस्टल में मेस और खेल के मैदान में भी बराबर होता है.

कमेटी  के सामने अनुसूचित जाति ऑर जनजाति के विद्यार्थियों ने बताया कि उन्हें हॉस्टल के मेस के अन्दर नहीं जाने दिया जाता, ये पूरी तरह ‘उच्च’ जाति वालो के लिए है, यदि हमारे विद्यार्थी किसी खेल कूद में भाग लेने की कोशिश करते है तो उनको गाली- गलौच और मार-पीट का शिकार होना पड़ता है.

कमेटी  ने पाया कि (पृ ३३)-

विद्यार्थियों के लिए दो प्रकार की मेस होती है- सामान्य मेस ऑर प्राइवेट मेस. प्राइवेट मेस में विभिन्न किस्म का भोजन उपलब्ध होता है और यह थोड़ा महंगा भी होता है. दलित आदिवासी विद्यार्थी केवल जनरल मेस में ही जा सकते है ऑर प्राइवेट मेस में उनका प्रवेश निषेध है. लगभग ७६ प्रतिशत अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों को प्राइवेट मेस ज्वाइन करने में प्रतिबन्ध झेलना पड़ा है.

खेल का मैदान भी जाति के वाइरस से नहीं बच पाया है. एक रेकॉर्डेड इंटरव्यू में एक दलित छात्र ने बताया-

वे अपना एक समूह बना लेते है. वे बास्केट बौल खेलते हैं. शुरुआत में हमारे बेच का एक छात्र उनके साथ खेलने गया उसे वहां  ऐसा बर्ताव मिला कि वह दुबारा बास्केट बॉल खेलने कि हिम्मत नहीं कर पाया. ….. वे बास्केट बॉल खेलते है और हम वोलिबॉल (हंसी). 

कमेटी अपनी रिपोर्ट के पृ ३६ पर कहती है

बास्केट बॉल एक ऐसा खेल है जो सिर्फ और सिर्फ सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए ही है. वँही वोलिबॉल और फुटबॉल आरक्षित वर्ग के लिए है. छात्रों से पूछा गया कि क्या उन्होंने विभिन्न खेलो में किसी किस्म का भेदभाव सहा तो ८८ प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्हें बास्केट बौल खेलने ऑर ६० प्रतिशत ने कहा कि क्रिकेट में भेदभाव का सामना कराना पड़ा.

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6 Comments leave one →
  1. July 14, 2011 9:33 am

    Dear Friends
    Namo Buddhay
    You know about Manish, He has die but he why die, we should think about Manish that why die………………………. we should take immediate action on our cast system because we have no profit from our lower cast , we save next Manish from cast death so we should stop cast system and then we could stand front of others community, Lord Buddha said that appo deepo bhavo , Appo sarana bhavo, I know our religious was Buddhist and now is Buddhist, so we should think about Buddhism where all people is equal, no cast , no hate , only love and blessing of Buddha.
    Buddha say : –“Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
    Pl. come with us and join us for a good cause.

    –“Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule. — Lord Buddha

    Thanks

    Amar Visharat
    Lord Buddha Trust
    09210122842

  2. Rajesh Kumar Ahirwar permalink
    November 25, 2011 9:18 am

    jati ke nam per itna bada anyay hamare sath desh ajad hone 60 sal bad bhi vahi suluk kiya ja raha jisse hame aaj ek hone ki awashyakta hai tatha Babasaheb dwara jalai gayee 1928 me manusmirtee ko dubara jalana hoga. aur ek hoker in sabhi ke prati nyay ke liye andolan karna hoga…

  3. January 15, 2012 8:25 pm

    wondering – how do family members cope up with suicides? they invest all they can in their childrens’ education ….thinking education would make them arrive at a better platform than they are at the present…if one admission to a prestigious colleges encourages 10 people in the community to study..does one suicide detract more?

  4. Mani permalink
    February 16, 2012 6:06 am

    Dalits need move out of india or have different a state, so called upper caste can never be our friends.They are same old people ,the same old mindset.Upper cast people and media are deceptive.Its easy to see there is nothing for dalits in country , thier women are unsafe.Thier children are ill treated.Police is additional burden on us. Upper promote corruption , violence and dishonesty .They do 90% harm to country while doing little progress and boast a lot .I think India is backward because of thier backwardmindset !

  5. Rajbahadur Singh Gautam permalink
    March 1, 2012 8:02 am

    dr. b.r. Ambedkar ke sapne ko aj Higher Education me toda ja harah hai. aj bhi log purani bywasth ko lagu karana chahte hai. Aj Higher Education me saikore path Teaching and NoN Teaching kholi hai. Mai Dr. thorat ko danna bad dena chahuga ginone Higher Education Chairmen ke pad me rahte huai dalit Teaching Post ko bharne ka thoda Prayas kiya.

  6. Rajbahadur Singh Gautam,Vice Prasident, DDU Gorakhpur University SC/ST Union,Gorakhpur permalink
    March 1, 2012 8:08 am

    Dr. Balmukund Bharti ke pariwar ko meri hardi Stradhanjali. Dr. Balmukund Bharti Amar Rahe. Amar Rahe ….

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